श्रृंगार रस व्याख्या


s = आधी अ

तत्र शृंगारोनाम एवमेष आचारसिद्धोहृद्योज्ज्वल वेषात्मकत्वाच्छृंगारो रसः I
स च स्त्रीपुरुषहेतुक उत्तमयुवप्रकृति:। शतस्य द्वे अधिष्ठाने सम्भोगो विप्रलम्भ श्च।
तत्र सम्भोगस्तावत्
ऋतुमाल्यानुलेपनालङ्कारेष्टजनविषवरभवनोपभोगोपवनमनानुभवन श्रवणदर्शनक्रीड़ालीलादिभिर्विभावैरुत्पद्यते। । (6. 45 पैथरा गद्य ) .
विप्रलम्भकृत: श्रृंगार
वैशिकशास्त्रकारैश्च दशावस्थोsभिहितः I ताश्व सामन्यभिनये वक्ष्याम :।
औत्सुक्यचिंतासमुथ: सापेक्षभावो विप्रलम्भकृत: ।। (6 ,45 पैथरा गद्य )
श्रृंगार रस -
सिद्ध आचरणों युक्त , उज्ज्वल जिकुड़ेळी (हृदयात्मक ) , ललित वेषधारी
अनुवाद , व्यख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई हूणो कारण से ये तै श्रृंगार रस बुल्दन। यु रस श्रेष्ठ (उदात्त ) प्रवृति अर स्वरूप का दगड़ , उत्तम वय (आयु ) का स्त्री -पुरुष मध्य अनुराग से प्रकशित हूंद। ये म सम्भोग अर विपलंभ द्वी अधिष्ठान ( संस्थान , प्रतिष्ठापन ) माने गेन।
सम्भोग ऋतुओं क मानसिक प्रभाव से , माळाऊं क सुसेवन , अनुलेप , अलंकरुं प्रयोग अर अपण प्रिय जनुं क संबन्धुं म छ्वीं बत्थ , बिगरैल कूड़ुं उपयोग , सुखदायी पवनक स्पर्श करण, बग्वानुं म घुमण, भली -सुंदर बत्थ सुणण अर दिखण, खिलण -विनोद करण जन विभावों से सम्भोग श्रृंगार उतपन्न हूंद।
श्रृंगार रसक एक प्रकार विप्रलम्भ बि हूंद। वैशिक शास्त्र म यांक दस अवस्थाओं वृत्तांत दियुं च। यांक विषय म मि अग्वाड़ी चर्चा करलु। विप्रलम्भ संबंधी भाव उत्सुकता (क्या ह्वाल क्या नि ह्वाल मनोस्थिति ) अर चिंता से उतपन्न हूंदन बल।

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